40+ WPM Hindi Dictation II High Court, SSC, Steno II S.NO. 26 II BUDDHA ACADEMY TIKGAMRH (MP)
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार का देश के 52 विश्वविद्यालयों और आठ कॉलेजों को स्वायत्तता देने का फैसला संघीय शिक्षा नीति की दिशा में उठाया गया एक साहसिक कदम है। आला दर्जे के प्रबंध संस्थानों और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) के लिए भी ऐसा ही कदम उठाने से सरकार का यह फैसला प्रस्तावित शिक्षा नीति में तय तर्कसंगत राह को दिखाता है। अगर मानव संसाधन विकास मंत्रालय के बंधन से मुक्त हो रहे संस्थानों की ऊर्जा गुणवत्तापरक शिक्षा मुहैया कराने पर केंद्रित हो रही है तो एक व्यापक सिद्धांत के तौर पर यह एक वांछनीय प्रगति है। हालांकि कई बिंदुओं पर संदेह भी पैदा होता है। पहला मुद्दा स्वायत्तता के दायरे से संबंधित है। इसमें एक प्रगतिशील और सशक्त करने वाली कवायद निहित है लेकिन काफी शक्तियां विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और मानव संसाधन विकास मंत्रालय में ही निहित हैं।
सरकार ने आला दर्जे के विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता देने की बात कही है लेकिन इस दर्जे का निर्धारण कौन करता है? गत 12 फरवरी को जारी एक अधिसूचना के मुताबिक राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं शिक्षा परिषद या किसी प्रतिष्ठित प्रमाणन एजेंसी मान्यता द्वारा दिए गए अंक ही इस वर्गीकरण का पैमाना होंगे। पहली संस्था तो यूजीसी के मातहत काम करती है जबकि प्रमाणन एजेंसी का निर्धारण अभी बाकी है। दो निजी एजेंसियों की तरफ से जारी दुनिया के शीर्ष 500 संस्थानों की रैंकिंग की भी वर्गीकरण में भूमिका होती है। अधिसूचना में जिक्र है कि किसी श्रेणी में उपस्थिति स्व-प्रमाणन पर निर्भर करती है लेकिन जब अंक देने की प्रक्रिया यूजीसी-आश्रित संस्थानों पर निर्भर है तो यह प्रावधान सर्कुलर को तर्कसंगत बना देता है। यह भी साफ नहीं है कि क्या कुलपति एवं प्रबंधन शिक्षकों की नियुक्ति भी यूजीसी के दायरे में आती है? बड़ा सवाल यह है कि क्या यह मान्यता तब भी बनी रहेगी जब कोई विश्वविद्यालय सरकार के सामाजिक एजेंडे से मेल नहीं खाने वाला कोई पाठ्यक्रम शुरू करता है या सरकार के प्रति आलोचनात्मक रुख रखने वाले शिक्षक को नियुक्त करता है।
भारत में मानविकी के पाठ्यक्रमों में सरकारी हस्तक्षेप के मामले बढऩे से ऐसे हालात पैदा होना नामुमकिन भी नहीं है। अमेरिका में भी रिचर्ड निक्सन और डॉनल्ड ट्रंप छात्र राजनीति के लिए मशहूर विश्वविद्यालयों को संघीय मदद रोकने की धमकी देते रहे हैं। भारत के लिए बड़ी चिंता यह है कि इस स्वायत्तता की असली वजह शैक्षणिक न होकर वित्तीय है। नई योजना में गुणवत्ता वाले संस्थानों को नए पाठ्यक्रम संचालित करने तथा नए विभाग, केंद्र एवं स्कूल खोलने की स्वतंत्रता होगी लेकिन इसके लिए संसाधन उन्हें खुद जुटाने होंगे।
Comments
Post a Comment