45 WPM Hindi Dictation II High Court, SSC, Steno II S.NO. 32 II BUDDHA ACADEMY TIKGAMRH (MP)
अल्पसंख्यकों का संरक्षण किसी भी सभ्यता का
खास पहलू माना जाता है। इसे लोकतांत्रिक एवं बहुलतावादी राजनीति का आवश्यक अंग भी
माना गया है। वहीं एक हालिया घटनाक्रम में देश के मुख्य न्यायाधीश की अगुआई में
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने जम्मू-कश्मीर राज्य@ में हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने से
इन्कार कर दिया। शीर्ष अदालत ने मुस्लिम बहुल राज्य में अल्पसंख्यक आयोग के गठन को
लेकर भी अपनी अक्षमता जाहिर की। जम्मू-कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे को देखते
हुए पीठ ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के दायरे का राज्य@ में विस्तार करने को लेकर भी अपनी
असमर्थता व्यक्त की। इससे महबूबा मुफ्ती सरकार भले ही कुछ राहत की सांस ले रही हो, लेकिन मुझे यही लगता है कि अव्वल तो इस याचिका की
कोई जरूरत ही नहीं थी और दूसरे तमाम ऐसी मिसालें हैं,@ जिनसे अदालत दूसरे नतीजे पर भी पहुंच सकती थी।
यह एक गलत धारणा है कि किसी समुदाय का
अल्पसंख्यक दर्जा कानून या अदालत से तय होता है। इस मसले को अंतरराष्ट्रीय और
भारतीय कानूनों द्वारा पूरी तरह पुष्ट किया गया है। 1930 की शुरुआत में@ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने ग्रेसो-बुल्गारिन
समुदाय के मामले में स्पष्ट किया था कि अल्पसंख्यक दर्जा महज आबादी की संख्या से
तय नहीं होता। इसके लिए साझा धार्मिक, नस्लीय भाषाई
चलन मायने रखते हैं जिन्हें कोई समूह परंपराओं, शिक्षा और
युवाओं के सामाजीकरण के जरिये सहेजकर @रखना चाहता है। इस अदालत ने आदेश दिया था कि किसी
समुदाय की पहचान किसी कानून पर निर्भर नहीं है। अगर कोई समुदाय तमाम सांस्कृतिक
पहलुओं पर ऐसा समूह बनाता है जो उन्हें दूसरों से अलग दर्शाता हो और यदि वह समूह
उन सांस्कृतिक प्रतीकों @को सहेजना
चाहता हो तो यही पहलू उन्हें अल्पसंख्यक दर्जा दिलाने के लिए काफी है।
एन एम्माद (1998) मामले में
सुप्रीम कोर्ट ने भी यही माना था कि अल्पसंख्यक दर्जे के लिए राज्य की मान्यता की
कोई जरूरत नहीं। भारतीय संविधान में भी ‘अल्पसंख्यक@’ शब्द का केवल
चार जगह ही उल्लेख है। हालांकि संविधान इसे उचित रूप से परिभाषित नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट का इस पर यही रुख रहा है कि अल्पसंख्यकों का निर्धारण जनसंख्या के
आधार पर होगा और वह भी राज्य विशेष पर निर्भर करेगा। केरल शिक्षा @विधेयक मामले (1957) के बाद से ही इस नीति में कोई बदलाव देखने
को नहीं मिला। इसके बाद शीर्ष अदालत की 11 सदस्यीय पीठ
ने टीएमए पई फाउंडेशन (2002) मामले में स्पष्ट किया कि ‘अल्पसंख्यक’ शब्द की किसी
उचित परिभाषा के अभाव में किसी भी @राज्य का ऐसा समूह जो कुल आबादी में पचास फीसद से
कम हो, अपनी सामुदायिक, धार्मिक या भाषाई परंपराओं के आधार पर अल्पसंख्यक
अधिकारों का हकदार हो सकता है। इस तरह से नगालैंड, मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल
प्रदेश, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर
और पंजाब में संख्या में कम@ होने के
लिहाज से हिंदू भी अल्पसंख्यक दर्जा हासिल करने की पात्रता रखते हैं।
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