45 WPM Hindi Dictation II High Court, SSC, Steno II S.NO. 31 II BUDDHA ACADEMY TIKGAMRH (MP)
खाप पंचायतों के संदर्भ में शीर्ष अदालत का मंगलवार को आया
फैसला ऐतिहासिक महत्व रखता है। यह बताता है कि हर बालिग को, चाहे वह महिला हो या पुरुष, अपनी मरजी से प्यार करने और
शादी करने का मौलिक अधिकार है। इसमें परिवार, खानदान या/ समाज का कोई व्यक्ति दखल नहीं दे सकता। अब यह कोई छिपा तथ्य नहीं
है कि खाप पंचायतें प्यार और शादी पर किस कदर पहरे बिठा देती हैं। हरियाणा के कैथल
में 2007 में हुए मनोज-बबली हत्याकांड की पड़ताल के दौरान मैंने खुद यह महसूस/ किया था। बेशक ये पंचायतें तमाम तरह के सामाजिक काम करने के दावे
करती हों, पर
असलियत में ये अनाप-शनाप पाबंदियां और कायदे ही थोपती हैं। महिलाएं फोन का
इस्तेमाल नहीं कर सकतीं, उन्हें
जींस पहनने का कोई अधिकार नहीं, वे साइकिल नहीं चलाएंगी जैसे/ फरमान अक्सर सुनाई दे जाते
हैं। यदि 21वीं सदी
के भारत की कोई सामाजिक या जातिगत पंचायत इस तरह के फैसले करती हो, तो उसकी रूढ़िवादिता का अनुमान
सहज लगाया जा सकता है।
खाप पंचायतें सिर्फ और सिर्फ संपन्न व धनाढ्य किसान परिवारों
के मर्दों /का जमावड़ा होती हैं। इनमें किसी
गरीब व्यक्ति और महिला को कोई स्थान नहीं मिलता। अमूमन जाति के नाम पर समाज में इस
तरह की संस्थाएं बनाई जाती हैं, जो गरीबों व वंचितों पर अत्याचार करने के सिवाय कुछ और नहीं
करतीं। सबसे खतरनाक तथ्य/ यह है कि ये पंचायतें अपने
फैसले से देश के कानून की भी खुली अवहेलना करती हैं।
खाप पंचायत का खौफ मैंने खुद चार-पांच साल पहले अनुभव किया
है। मुझे खबर मिली थी कि हरियाणा के गुरुग्राम के नजदीकी गांव का एक शादीशुदा
प्रेमी जोड़ा /भागकर दिल्ली आया है। लड़का दलित
जाति का था और लड़की माली जाति की। स्थानीय खाप पंचायत इस अंतरजातीय शादी के खिलाफ
थी, इसलिए उस
जोड़े ने अपनी जान बचाने के लिए गांव छोड़ना ही मुनासिब समझा था। हम उसे लेकर हौजखास
थाने गए। मगर/ खाप पंचायत के लोग रात भर उस
थाने को घेरकर बैठे रहे। इतना ही नहीं, उस जोड़े को चुपके से वहां से
निकालकर जब उनकी मौसी के यहां महरौली पहुंचाया गया, तो वहां भी उन लोगों ने घेरा
डाल दिया। वे मारने-काटने की धमकी दे/ रहे थे। कल्पना कीजिए,जब राजधानी दिल्ली में ये लोग
ऐसा व्यवहार कर सकते हैं, तो फिर
अपने क्षेत्र में किस हद तक दबाव बनाते होंगे। निश्चित ही गांव में उस परिवार का
रहना मुश्किल हो जाता होगा, जिसका
बच्चा अपनी मरजी से अंतरजातीय प्रेम विवाह/ करता है। जबकि हमारा संविधान
हर बालिग को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने का हक देता है।
इस तरह की संस्थाएं सिर्फ
पितृसत्तात्मक समाज के हथियार हैं। इन्होंने हमेशा समाज में औरतों को दबाकर रखने
का प्रयास किया है। आज भी वे बदलने को तैयार/ नहीं दिखतीं।
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