45 WPM Hindi Dictation II High Court, SSC, Steno II S.NO. 27 II BUDDHA ACADEMY TIKGAMRH (MP)
सर्वोच्च न्यायालय ने कावेरी जल विवाद को लेकर हाल ही में जो निर्णय दिया है वह बताता है कि जल के मुद्दे पर प्रशासन को बेहतर करना होगा। स्वच्छ और ताजा पानी बहुत तेजी से एक दुर्लभ संसाधन में तब्दील होता जा रहा है। आजादी के वक्त प्रति व्यक्ति सालाना पानी की उपलब्धता करीब 5,000 घन मीटर थी जो अब गिरकर 1,500 घन मीटर रह गई है। यह स्तर वैश्विक मानक से नीचे है और पानी पर पड़ रहे दबाव को स्पष्ट करता है। यह हमारा राष्ट्रीय औसत है और कई जगह तो यह घटकर 1,000 घन मीटर रह गया है जो वैश्विक औसत से काफी कमतर है।
पानी एक ऐसा संसाधन है जिसे काफी खतरा उत्पन्न हो चुका है। पहली बात तो यह कि हमारे 20 से अधिक विकासशील ब्लॉकों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है और यह अस्थायी स्तर पर पहुंच चुका है। आजादी के बाद हमने जो 4,000 से अधिक बांध बनाए हैं उनमें नदियों से बहकर आने वाले पानी का स्तर भी काफी कम हो चुका है। यहां तक कि देश की कई नदियों की सेहत खतरे में आ चुकी है। दूसरी बात, प्रदूषण भी नदियों की सेहत को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। शहरी क्षेत्र में घरेलू इस्तेमाल में आने वाला पानी और औद्योगिक गंदगी का पानी नदियों और झीलों में जाकर उन्हें प्रदूषित कर रहा है। प्रत्येक लीटर गंदे और प्रदूषित पानी से 5 से 8 लीटर स्वच्छ जल प्रदूषित हो जाता है। तीसरा है जलवायु परिवर्तन को लेकर उपज रहा खतरा।
हम जो पानी इस्तेमाल करते हैं वह वर्षा से आता है और साल के दो महीनों के दौरान बरसा होता है। मॉनसून की अनिश्चितता को देखते हुए कहा जा सकता है कि बाढ़ और सूखे आदि के प्रबंधन की मदद से ही पानी का उचित प्रबंधन हो सकता है। इसके अलावा पानी की उपलब्धता पर निगरानी रखना भी आवश्यक है। जल संकट का प्रबंधन करने के लिए किफायत और क्षमता वृद्घि की जरूरत है। इसके अलावा साझा संसाधनों के उपयोगकर्ताओं के बीच उचित और समान इस्तेमाल की दिशा में सहयोग भी आवश्यक है। किफायत उत्पन्न करने के लिए मूल्य सुधार करना आवश्यक है। मौजूदा हालात में यह मुश्किल लगता है। बड़े औद्योगिक उपयोगकर्ताओं तथा शहरी प्रशासन पर पर प्रदूषण प्रबंधन की जिम्मेदारी डालना अवश्य संभव है। उदाहरण के लिए हम जोर दे सकते हैं कि इन बड़े उपयोगकर्ताओं की ताजा पानी की जरूरत उन्हीं नदियों और झीलों से पूरी की जाए जिनमें वे अपनी गंदगी उड़ेलते हैं।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हमें ऐसी व्यवस्था करनी होगी जहां उपयोगकर्ताओं के बीच सहयोग की व्यवस्था की जा सके। आज पानी को लेकर जो भी उथलपुथल है वह हमारी राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों को ही दर्शाता है। कानूनी अधिकार व्यापक तौर पर राज्य सरकारों के पास रहता है और कुछ हद तक स्थानीय निकाय के पास। हालांकि देश में जलीय तंत्र के भूगोल की बात करें तो इसमें वाटरशेड (जहां कई तरह की जलधाराएं मिलती हों) जलाशय, नदी बेसिन, आदि तमाम शामिल हैं। इन सभी के इस्तेमाल को लेकर एक सहकारी व्यवस्था करने के लिए पानी के बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है।
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