45 WPM Hindi Dictation II High Court, SSC, Steno II S.NO. 28 II BUDDHA ACADEMY TIKGAMRH (MP)
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू
नायडू और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष अमित शाह के बीच हालिया
विवाद यह बताता है कि कैसे तेलंगाना के अलग राज्य के रूप में गठन का आर्थिक
प्रभाव अभी भी राज्य की राजनीति को प्रभावित कर रहा है। आंध्र प्रदेश के
राजनेताओं को यह आशंका रही है कि हैदराबाद के तेलंगाना में शामिल होने के
बाद प्रदेश के राजस्व पर बहुत नकारात्मक असर होगा। यही वजह है कि उन्होंने
राज्य को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग की। इस दर्जे के तहत राज्य को मिलने
वाली केंद्रीय सहायता में वृद्घि की जाती है। आमतौर पर यह सहायता पहाड़ी,
दूरवर्ती और आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों के लिए होती है। जब मनमोहन सिंह
प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने मौखिक रूप से विशेष राज्य का दर्जा देने की
बात कह कर राज्य के विभाजन को आसान बनाया। परंतु भाजपानीत राजग सरकार के
कार्यकाल में यह दर्जा नहीं दिया गया। नायडू के लिए यह बड़ी राजनीतिक
शर्मिंदगी का विषय बन गया था क्योंकि उनकी पार्टी राजग की सदस्य थी। इसलिए
विपक्ष, खासतौर पर वाईएसआर कांग्रेस को रोकने के लिए नायडू ने अपने दल
तेलुगू देशम को राजग से अलग कर लिया।
शाह ने गत सप्ताह नायडू को नौ पृष्ठों का
पत्र लिखकर बताया कि केंद्र आंध्र प्रदेश की जितनी सहायता कर सकता था उसने
उतनी की। उन्होंने इस आधार पर तेलुगू देशम के राजग से अलग होने की आलोचना
भी की। शाह ने केंद्र की सहायता वाली कई विकास परियोजनाओं का जिक्र करते
हुए आरोप लगाया कि तेलुगू देशम की सरकार दिए गए फंड का सही इस्तेमाल नहीं
कर पाई। केंद्र सरकार की दलील है कि किसी नए राज्य को यह दर्जा नहीं दिया
जा सकता है। उसने एक स्पेशल परपज व्हीकल (एसपीवी) गठित करने की बात कही थी।
इसके तहत कुछ अतिरिक्त फंड दिया जा सकता है। शाह ने अपने पत्र में पूछा कि
आखिर क्यों नायडू ने उस सुझाव को अपनाने से इनकार कर दिया। उन्होंने यह भी
कहा कि ऐसे फंड को दूसरी जगह स्थानांतरित करना मुश्किल था। एक तरह से उनका
कहना था कि राज्य को विशेष दर्जा देने की मांग इसलिए की जा रही थी ताकि
भ्रष्टाचार किया जा सके।
उन्होंने आंध्र प्रदेश सरकार के राजस्व
घाटे के आकलन के तरीके पर भी सवाल उठाया। नाराज नायडू ने यह पत्र राज्य
विधानसभा में पढ़ा और कई सवालों के जवाब भी दिए। उदाहरण के लिए उन्होंने
कहा कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने राजस्व घाटे का आकलन किया
था, यह भी कहा गया कि नए पूंजी फंड में से 32 फीसदी व्यय किया गया, न कि 8
फीसदी। उन्होंने कहा कि एसपीवी के जरिये आने वाले फंड पर निर्वाचित नेताओं
का नियंत्रण नहीं होता और इस तरह यह राज्य के हितों और संप्रभुता पर हमला
है।
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