45 WPM Hindi Dictation II High Court, SSC, Steno II S.NO. 29 II BUDDHA ACADEMY TIKGAMRH (MP)
भ्रष्टाचार से निपटने और प्रशासन को पारदर्शी बनाने के तकाजे पर हमारी सरकारें कितनी संजीदा हैं इसकी एक बानगी लोकायुक्त की नियुक्ति के मामले में सरकारों के रवैए से मिल जाती है। एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछले हफ्ते सर्वोच्च न्यायालय ने एक केंद्रशासित प्रदेश और ग्यारह राज्यों के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी कर दो हफ्ते में यह बताने को कहा कि उनके यहां लोकायुक्त की नियुक्ति अब तक क्यों नहीं हुई है। इसके साथ ही, अदालत ने इन राज्यों से यह भी पूछा है कि उनके यहां लोकायुक्त की नियुक्ति कब तक हो जाएगी। ये राज्य हैं जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केंद्रशासित पुदुच्चेरी। इस जवाब तलब से, स्वाभाविक ही उम्मीद बनती है कि लोकायुक्त की नियुक्ति इन राज्यों में भी जल्दी ही हो जाएगी। विचित्र है कि लोकपाल और लोकायुक्त से संबंधित कानून संसद से सर्वसम्मति से पारित होने के चार साल बाद भी अमल की बाट जोह रहा है। केंद्र ने जहां अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं की है, वहीं कुछ राज्यों ने लोकायुक्त को वजूद में आने नहीं दिया है। जबकि उपर्युक्त कानून में कहा गया है कि उसके लागू होने के साल भर के भीतर राज्यों को लोकायुक्त की नियुक्ति करनी होगी। लेकिन जहां कुछ राज्यों ने नियुक्ति नहीं की है, वहीं कुछ राज्यों ने 2013 में संसद से पास हुए कानून के अनुरूप लोकायुक्त अधिनियम पारित नहीं किया है।
केंद्र सरकार लोकपाल के मामले में यह दलील देती रही कि चूंकि लोकसभा में कोई मान्यता-प्राप्त नेता-प्रतिपक्ष नहीं है, इसलिए चयन प्रक्रिया की शर्त पूरी नहीं हो पा रही है। लेकिन अगर वह चाहती तो लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता की राय लेकर प्रक्रिया कब की पूरी कर सकती थी। हाल में जब सर्वोच्च अदालत की फटकार लगी तब उसे इसके लिए राजी होना पड़ा। बहरहाल, जिन राज्यों में लोकायुक्त नहीं हैं वहां उनकी नियुक्ति जल्द से जल्द होनी चाहिए। लेकिन क्या उनमें और बाकी राज्यों में कोई खास फर्क नजर आता है? इसका जवाब उत्साहजनक नहीं है। इसकी वजह यही है कि जहां लोकायुक्त हैं भी, उनकी शक्तियां और संसाधन बहुत सीमित हैं। उनके पास कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी नहीं है। जांच के लिए उन्हें संबंधित राज्य सरकार का मुंह जोहना पड़ता है। अगर सबूत ही नहीं जुटेंगे तो शिकायत को कार्रवाई के अंजाम तक ले जाना कैसे संभव होगा? लिहाजा, आश्चर्य नहीं कि लोकायुक्तों की भूमिका अमूमन सिफारिशी होकर रह गई है।
मंत्रियों और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार के मामलों में जांच और आगे की कार्रवाई के लिए एक स्वतंत्र संस्था के तौर पर लोकपाल और लोकायुक्त की अवधारणा 1966 में प्रशासनिक सुधार आयोग की अंतरिम रिपोर्ट से सामने आई थी। इसके बाद, लोकायुक्त कानून लाने वाला महाराष्ट्र पहला राज्य बना।
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