40 WPM Hindi Dictation II High Court, SSC, Steno II S.NO. 41 II BUDDHA ACADEMY TIKGAMRH (MP)
सर्वोच्च न्यायालय
ने सुभाष महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित
जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के संदर्भ में जो निर्णय दिया है, उसे सही
तरीके से समझने की आवश्यकता है। यह स्वागतयोग्य निर्णय है, क्योंकि एक@ ओर संविधान में अनुच्छेद 21 के तहत देश के
नागरिकों को प्रदत्त स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार हैं। जबकि दूसरी ओर अनुसूचित
जाति और जनजाति के नागरिकों के खिलाफ नफरत फैलाने वाले अपराधों से सुरक्षित करने
वाले कानून@ हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संविधान के
अनुच्छेद और एससी/एसटी एक्ट के बीच समन्वय स्थापित करने वाला है।
अदालत के एक्ट के संदर्भ में आवश्यक
दिशा-निर्देश दिये हैं, जिससे एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर रोक लग सके।@ कोर्ट का फैसला नियामकीय है और एक्ट के
प्रावधानों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। कोर्ट ने एफआआर दर्ज किये जाने से मना
नहीं किया है, बल्कि एफआईआर दर्ज किये जाने के बाद अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं
होने @के चलते की जाने वाली तुरंत गिरफ्तारी को गलत
बताया है, क्योंकि यदि संबंधित व्यक्ति निर्दोष है तो जांच के बिना ही एक्ट के
प्रावधान के तहत की जानी वाली गिरफ्तारी, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त
मौलिक @अधिकारों के उल्लंघन का कारण बनती है। कोई के
समक्ष न केवल ऐसे मामले आये, जिनमें दलित वर्ग के कुछ लोगों ने अनुचित दबाव बनाने
के लिए या अपनी बात मनवाने के लिए अधिनियम के प्रावधानों का दुरुपयोग किया, बल्कि@ ऐसे भी मामले आये जिनमें सवर्ण जाति के लोगों ने
दलित वर्ग के लोगों को मुहरा बनाकर एक्ट के प्रावधानों का दुरुपयोग किया।
एससी/एसटी एक्ट की धारा 4 के तहत दलित वर्ग
को अधिकार दिये गये हैं कि एफआइआर दर्ज @करने से
इनकार नहीं किया जा सकता और यदि किया जाता है तो यह अपराध होगा। इस प्रावधान में
कोर्ट के 20 मार्च के फैसले में कोई बदलाव नहीं किया गया है बल्कि एफआइआर दर्ज किए
जाने के बाद प्रारंभिक@ जांच करने की बात
कही है। इसी तरह, एक्ट की ही धारा 18 के अंतर्गत प्रावधान है कि अग्रिम जमानत
नहीं दी जा सकती। इस प्रावधान में भी कोई बदलाव नहीं किया गया है। कोर्ट ने कहा कि
प्रारंभिक जांच के तहत @सरकारी कर्मचारियों
के मामले में विभागाध्यक्ष और आम नागरिकों के मामले में पुलिस अधीक्षक की अनुमति
ले ली जाए क्योंकि कई बार संबंधित विभाग में वयाप्त आंतरिक राजनीति या आपसी
रंजिश के चलते झूठी एफआइआर भी दर्ज करा दी जांच @में
लगाया जा सकता है।
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