40 WPM Hindi Dictation II High Court, SSC, Steno II S.NO. 59 II BUDDHA ACADEMY TIKGAMRH (MP)
ताजा घटनाओं ने इस तथ्य की पुष्टि एक बार फिर कर दी है कि वोटों की
फसल काटने के लिये नेता किसी भी हद तक जा सकते है। पहली घटना एससी-एसटी कानून में
बदलाव को लेकर है तो दूसरा मुद्दा कावेरी जलविवाद से जुड़ा है एससी-एसटी कानून में
संशोधन के खिलाफ एससी-एसटी संगठनों ने भारत बंद करके कानून व्यवस्था की स्थिति
बिगाड़ दी सरकार से लेकर राजनैतिक दल भी सकते में आ गए हैं देश की सर्वोच्च अदालत
के फैसले के खिलाफ आयोजित बंद में जमकर
हिंसा आगजनी और तोड़-फोड़ हुई कांग्रेस समेत अनेक विपक्षी दल तो भारत बंद के
समर्थकों के साथ मिलकर सामने भी आ गए दलित वोटों का लालच शायद उन्हें उनके पाले
में खींच ले गया। फिर भला केंद्र की सत्ता में बैठी भाजपा कैसे पीछे रहती? फैसला
आने के 12 दिनों तक शांत बैठी रहीं केंद्र ने बंद के राजनैतिक नफा-नुकसान पर मंथन
के बाद सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका लगाकर स्टे की मांग कर डाली। यह बात
और है कि अदालत ने केंद्र की मांग ठुकराते हुए साफ कर दिया कि उसने कानून की
धाराओं से कोई छेड़-छाड़ नहीं की है, अदालत चाहती है कि इस कानून का दुरुपयोग न हो
और किसी भी निर्दोष को सजा नहीं मिलने पाये। साथ ही जो दोषी हो, उसके खिलाफ
विधिसम्मत कार्रवाई हो।
सर्वोच्च न्यायलय ने सभी
पक्षों को दो दिन में इस मुद्दे पर अपना विस्तृत नजरिया पेश करने को कहा। 10 दिन
बाद वह इस मसले पर सभी के जवाबों के अध्ययन के बाद सुनवाई करेगी। केंद्र सरकार
सुप्रीम कोर्ट की भावना समझती थी लेकिन मामला वोटों से जुड़ा था इसलिए पुनर्विचार
याचिका डालने में देरी नहीं की गई। दूसरा मामला तमिलनाडु में कावेरी जलविवाद से
जुड़ा है। कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन की मांग को लेकर इन दिनों तमिलनाडु सुलग
रहा है कोयम्बटूर में दो लोग आत्मदाह की कोशिश कर चुके है तो प्रमुख विपक्षी दल
डीएमके ने भी धरने प्रदर्शन की चेतावनी दे रखी है। मुद्दा राज्य के हित का है
यानी यहां भी मामला वोटों से सीधे जुड़ा है। सो भला सत्तारूढ़ दल कैसे पीछे रहता
विपक्ष आंदोलन का लाभ न लूट लें इसलिए राज्य के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी
उपवास पर बैठे राजनेताओं को अब न चिंता आंदोलन की रह गई है और न डर उन्हें
संवैधानिक पदों का रह गया महत्वपूर्ण यह रह गया है कि हर मुद्दे पर कौन कितने
घड़ियाली आंसू बहा सकता है।
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