45 WPM Hindi Dictation II High Court, SSC, Steno II S.NO. 49 II BUDDHA ACADEMY TIKGAMRH (MP)
नए वित्त वर्ष
की शुरुआत हो चुकी है, लिहाजा समाप्त वित्त वर्ष 2017-18 से संबंधित आंकड़ों
का परीक्षण करना श्रेयस्कर है ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल पता चले। गत वित्त ïवर्ष में
वस्तु एवं सेवा कर के क्रियान्वयन से मची व्यापक उथलपुथल के चलते# न केवल
सरकारी राजस्व बल्कि निजी क्षेत्र का कामकाज भी प्रभावित हुआ। शुरुआती दौर की
अड़चनों को परे रखें तो यह साफ है कि जीएसटी को लागू करने का कदम न केवल लक्षित
राजस्व जुटाने के मामले में सफल रहा है बल्कि आशंकाओं के उलट# इससे महंगाई
भी नहीं बढ़ी है। असल में, 2017-18 के बड़े हिस्से में
मुद्रास्फीति अनुमान से भी कम रही। हालांकि समाप्त वित्त वर्ष के अंतिम दौर में एक
बार फिर मुद्रास्फीति बढ़ाने वाले दबाव नजर आने लगे। इससे व्यापक आर्थिक संकेतकों
के बारे में पहले# की तुलना में अधिक अनिश्चितता दिखने लगी है। जनवरी 2018 के आखिर में
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 65 डॉलर प्रति बैरल के
ऊपर चले गए थे। राजकोषीय घाटे के अलावा चालू खाते के घाटे पर भी इसका असर हो सकता
है। राजकोषीय# एकीकरण के लिए अपनी योजनाओं में नरमी लाने का सरकार का निर्णय
इस बात का संकेत है कि व्यापक आर्थिक चिंताएं अधिक अहम हो रही हैं। पिछले वित्त
वर्ष की दूसरी छमाही में बॉन्ड बाजार में गिरावट का दौर देखा गया। दस साल की अवधि# वाली सरकारी
प्रतिभूतियों पर मुख्य प्रतिफल वित्त वर्ष में अधिकांश समय बढ़त पर ही रहा। पिछले
कई दशकों में यह सबसे अधिक बॉन्ड प्रतिफल देने वाला साल रहा। हालांकि अब सरकार ने
अपने उधारी कार्यक्रम को नए सिरे से तैयार कर बॉन्ड बाजार में कुछ# हद तक
स्थिरता लाने की कोशिश की है।
हालांकि बॉन्ड
बाजार में भगदड़ कायम रहने के कुछ अवयव अब भी निहित हैं। मध्यम एवं लंबी अवधि के
गिल्ट फंड को 2017-18 में नुकसान उठाना पड़ा और नए वित्त वर्ष
में भी उनका प्रदर्शन बेहतर होने# की कोई
निश्चितता नहीं है। पिछले साल के खराब प्रदर्शन के बावजूद खुदरा निवेशकों ने
सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान में अपने पैसे लगाने जारी रखे। इक्विटी बाजार के
लिए क्या यह साल अच्छा रहने का सूचक है? निफ्टी वर्ष 2017-18 में करीब 12 फीसदी की# बढ़त पर रहा।
वैसे वित्त वर्ष के आखिर में इक्विटी बाजार में करीब 10 फीसदी की गिरावट भी देखी गई, इसके बावजूद यही कहा जा रहा है कि बाजार ‘काफी महंगा’ हो चुका है। कंपनियों की कमाई अनुमानों से कम रहने का सिलसिला
जारी है।# जहां रियल्टी शेयरों का प्रदर्शन अच्छा
रहा है वहीं नियामकीय एवं अन्य चिंताओं के चलते रियल एस्टेट क्षेत्र उपभोक्ता
निवेश के लिहाज से प्रभावित ही रहा। साफ है कि भरोसेमंद निवेश साधनों की तलाश जारी
है। हालांकि सरकार ने परिवारों की बचत का बड़ा हिस्सा# औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाने की पहल की है।
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