45 WPM Hindi Dictation II High Court, SSC, Steno II S.NO. 48 II BUDDHA ACADEMY TIKGAMRH (MP)


भारत को पूरा भरोसा है कि नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की तीन दिवसीय दिल्ली यात्रा से दोनों देशों के रिश्तों के बीच जमी बर्फ पिघल सकती है। हालांकि ओली चीन समर्थक माने जाते हैं, बावजूद इसके उन्होंने किसी नेपाली प्रधानमंत्री द्वारा पदभार ग्रहण करने के बाद विदेशी दौरों की शुरुआत नईदिल्ली से करने की परंपरा के प्रति विास जताया है। 2015-16 में जब वह प्रधानमंत्री थे, तब नेपाल के नये संविधान की व्याख्या का मुद्दा इतना गहरा गया था कि दोनों देशों के रिश्तों में खटास आ गई थी। मधेसी आंदोलन और नेपाल की आर्थिक नाकेबंदी के लिए ओली ने सीधे तौर पर भारत को जिम्मेदार ठहराया था। इस आरोप में आंशिक सचाई भी रही क्योंकि नेपाल स्वतंत्र-संप्रभु राष्ट्र है।
उसके आंतरिक मामले में दखल अवैध और गलत है। हाल के दिनों में चीन का कम्युनिस्ट नेतृत्व जितना ताकतवर हुआ है, और दक्षिण एशिया में भारत के समक्ष जिस तरह से नई-नई चुनौतियां पेश कर रहा है, उसके मद्देनजर नेपाल की भू-राजनीतिक स्थिति ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गई है। भारतीय राजनय इस बात को गंभीरता से महसूस कर रहा है। दबे स्वर माना जा रहा है कि नेपाल में 2015 में हुई आर्थिक नाकेबंदी से निबटने में भारत से गलतियां हुई जिनसे नेपाल को चीन की ओर देखना पड़ा। ओली के प्रधानमंत्री बनने से चीन ज्यादा उत्साहित है।
उसे उम्मीद है कि ओली की मदद करके वह दक्षिण एशिया की राजनीति में ज्यादा सक्रिय भूमिका अदा कर सकता है। लेकिन दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनावों में वामपंथी गठबंधन की भारी जीत पर ओली को बधाई देकर 2015-16 की रणनीतिक भूल सुधारने में महत्त्वपूर्ण पहल की। सरकार के गठन का इंतजार किए बगैर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को विशेष संदेश देकर नेपाल भेजा था। विदेश मंत्री ने नेपाली नेतृत्व को साफ शब्दों में बताया कि भारत नेपाल में राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक समृद्धि चाहता है। इसमें दो राय नहीं हैं कि ओली नेपाल के लोकतांत्रिक इतिहास में सबसे ताकतवर नेता के रूप में उभर कर आए हैं। इसलिए माना जा रहा है कि भारत के साथ आर्थिक-राजनीतिक सौदेबाजी करने में उनका पलड़ा भारी रहेगा। ओली बखूबी जानते हैं कि नाकेबंदी के दौरान उन्होंने जिस तरह भारत विरोधी कूटनीति अपनाई उसके कारण भी उन्हें चुनावों में सफलता मिली है।
लेकिन उन्हें यह भी समझना चाहिए कि हर बात के लिए भारत की आलोचना करने के विपरीत परिणाम भी हो सकते हैं। दरअसल, ओली तकनीकी रूप से अल्पमत सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्हें अपनी सत्ता को दीर्घायु बनाने के लिए अपने सहयोगी दल माओवादी सेंटर के साथ तुष्टीकरण की नीति अपनानी होगी। उनकी खुद की पार्टी नेकपा के परस्पर विरोधी धड़ों को भी साथ लेकर चलना बड़ी चुनौती है, इसके अलावा, संघीय व्यवस्था के तहत बने नये राज्यों के प्रबंधन के लिए भारी विदेशी आर्थिक सहायता की जरूरत है।

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