40 WPM Hindi Dictation || High Court, SSC, Steno || S.NO.108|| BUDDHA ACADEMY TIKGAMRH (MP)
यह अध्याय मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही
प्रारंभ होने से संबंधित है। जहां अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के समक्ष हारिज होने
के लिये समन किया गया, इस अध्याय के अंतर्गत कार्यवाही आरंभ हो जाती है और उसके
बाद मजिस्ट्रेट धारा 203 के अंतर्गत परिवाद को खारिज नहीं कर सकता। आदेशिका जारी
होने के समय न्यायालय यह उपपादित करने के लिये अपेक्षित है कि क्या प्रथम दृष्टया
मामला बनता है। उसे साक्ष्य की पर्याप्तता या अभियुक्त के दोषी होने की संभाव्यता
का अवधारण करने की न तो आवश्यकता होती है और न ही करना चाहिए। इस बारे में विनिश्चय
पर आने के लिये की क्या आदेशिका जारी होनी चाहिए, मजिस्ट्रेट को परिवाद को देखने
से प्रकट होने वाली अंतर्निहित असंभाव्यताओं पर या अभिकथनों के समर्थन में
परिवादी द्वारा लाये गये साक्ष्य पर विचार करना होता है। सेशन विचारणीय मामले में
मजिस्ट्रेट द्वारा साक्ष्य की गहन परीक्षा अनुज्ञेय नहीं है। मजिस्ट्रेट यह
जांच प्रारंभ नहीं कर सकता कि क्या गुणागुण पर प्रथम दृष्टया मामला सिद्ध हुआ
है।
समन
के स्थान पर वाण्रट जारी करने के लिये प्रकरणों का अभिलेखन समन मामले में
आज्ञापक है और वारंट मामले में ऐसा नहीं है। जब वारंट मामले में अभियुक्त का फरार
हो जाना दर्शाया जाता है, कोई अवैधता नहीं की गयी है, यदि गैर-जमानती वारंट जारी
करने के लिये न्यायालय आदेश करता है। परिवाद को वैसा ही पढ़ा जाना होता है जैसा वह
है और परिवाद में परिवादी द्वारा किये गये अभिकथनों को वैसा ही पढ़ना होता है जैसे
वे हैं तथा मजिस्ट्रेट को यह पता लगाने के लिये न्यायिक चित्त लगाना होता है कि
क्या भा.दं.सं. के उपबंधों द्वारा विनिर्दिष्ट अपराध प्रथम दृष्टया स्पष्ट
बताया गया है या नहीं।
सेशन
न्यायालय द्वारा अनन्य रूप से विचारणीय मामले में धारा 203 तथा धारा 204 के
प्रक्रम पर मजिस्ट्रेट को जो कुछ करना होता है उससे यह देखना होता है कि कि क्या
धारा 200 तथा धारा 202 के अंतर्गत प्रारंभिक जांच के दौरान परिवाद तथा लेखबद्ध
साक्ष्य के सरसरी तौर पर परिशीलन पर अभियुक्त के विरुद्ध अनुमानित आरोप में
प्रथम दृष्टया साक्ष्य है, इस प्रक्रम पर मजिस्ट्रेट को साक्ष्य को
गहनतापूर्वक नहीं विचारना चाहिए जैसे कि वह विचारण न्यायालय को। साक्ष्य की
सूक्ष्म जांच करने में मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाया हुआ मानक वैसा नहीं रहता है
जैसा आरोपी की विरचना के प्रक्रम पर ध्यान में रखा जाना होता है। आरोप विरचित
करने के प्रक्रम पर भी साक्ष्य का सत्य, सत्यवादिता तथा प्रभाव जो कि अभियुक्त
विचारण पर प्रस्तुत करता है अथवा प्रस्तुत करने का प्रस्ताव रखता है, कि
गहनापूर्वक विवेचना नहीं होनी चाहिए। प्रमाण तथा निर्णय का स्तर, जिसे अभियुक्त
को दोषी या अन्यथा पाये जाने के पूर्व अंतिम रूप से अनुप्रयुक्त होना है, आरोप
विरचित करने के प्रक्रम पर यथावत् अनुप्रयुक्त नहीं किया जाना होता है।
Comments
Post a Comment